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अभिमत

कवि की प्यास गंगा का उद्गम चाहती है! गंगा तो आद्यंत पवित्र है, फिर गंगा का उद्गम ही क्यों?यह कैसी प्यास है? मैंने बहुत पहले लिखा था -” मैं नीर भरी दुःख की बदली…”, सोचा था कि बदली बरसेगी, वन-उपवन,कुटी- महल, मरुथल – बीहड़,सभी की तृष्णा शांत होगी!तब मैंने ऐसा सोचा भी नहीं था कि कोई ऐसा भी पिपासु मिलेगा,जो गंगा नहीं, गंगा का उद्गम चाहेगा! गंगा के उद्गम से अभिप्राय : हिमालय की गंगोत्री नहीं,शिव की जटाएॅ नहीं, ब्रह्मा का कमंडल भी नहीं! गंगा तो त्रिभुवन नारायण के श्रीचरणों का प्राच्छालन है,चरणाम्बु है,तो गंगा का उद्गम भी श्रीपति के चरणारविन्द ही होंगे, अर्थात – परम पद!
मेरी शुभकामना है कि चिरञ्जीव सुधाकर की चिर पिपासा को,जन्म – जन्मांतर की छटपटाहट को ‘ गंगा का उद्गम ‘ मिले!

 

- महादेवी वर्मा
प्रयागराज

इस संग्रह (गंगा का उद्गम)की रचनाओं में बड़ा वैविध्य है। छंदों का वैविध्य, चित्रात्मकता और संगीतात्मकता! ऐसा संयोग बड़ी साधना से सॅवरता है। इसमें भावभीने रससिक्त गीतों के अतिरिक्त कवि ने राष्ट्र के प्रति स्तवन में उसके विभिन्न प्रदेशों के सौंदर्य और महिमा का भी वर्णन किया है, जिसमें उसकी सूक्ष्म दृष्टि और चित्रात्मक अभिव्यंजना का परिचय मिलता है।इस वैविध्य में बुंदेलखंडी भाषा में लोकधुन में रचित उसकी रचनाएँ ऐसी मनोमुग्धकारी हैं कि मिट्टी की सोंधी सुगन्ध से गमगमाती उनकी व्यंजनाएँ सर्वोपरि बन पड़ी हैं।
वस्तुत: इस संग्रह की रचनाओं की शक्ति उनकी गहनतम अनुभूतियों और स्वत: प्रादुर्भूतव्यंजनाओं में है! सच पूछा जाये तो ये रचनाएँ ‘ गंगा के उद्गम ‘ के प्रतीक को सच्चे अर्थ में सार्थक करती हैं!

- डाॅ.शिवमंगल सिंह सुमन
समर्पण उज्जैन

बिजना राज्य के मॅझले राजा,भूदानी-सर्वोदयी श्री लोकेन्द्र भाई ने बालकवि के रूप में सुधाकर भाई से मेरा परिचय कराया था। मुरैना जिले के ग्राम बुधारा,जौरा और बुंदेलखंड के जटाशंकर, छतरपुर, टीकमगढ़ आदि स्थानों पर दुर्दांत डाकुओं के हृदय परिवर्तन -समर्पण कराने के लिये आयोजित सर्वोदय और राष्ट्रीय युवा योजना के शिविरों में सुधाकर भाई ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था।इनका सुरीला कविता पाठ सभी सुनने वालों में जोश भर देता था।बाद में फिल्म जगत के संगीतकार श्री कल्याण जी – आनंद जी के यहाॅ(मुम्बई में) अचानक सुधाकर भाई से मिलना अच्छा लगा।अभी बालाघाट के आदिवासी अंचल में एकता परिषद के आयोजन में वर्षों बाद सुधाकर भाई को देखा, अब तो ये बालकवि नहीं रहे, युवा हो गये। बालाघाट में इनके घर पहुॅचकर बहुत अच्छा लगा।ये खूब तरक्की करें, अच्छा साहित्य रचें,यही कामना है।

 

- एस.एन. सुब्बाराव
कैम्प- गढ़ी(बैहर)
गाॅधी शांति प्रतिष्ठान नयी दिल्ली।

बड़ी प्रसन्नता का विषय है कि काव्य गंगा और ज्ञान गंगा का संगमित रूप, जिसमें त्रिवेणी उपजने वाली सरस्वती अदृश्य होकर भी वर्तमान रहती है,” हिंदी के चिरदानी मुंशी अजमेरी ” ग्रंथाकार के रूप में प्रकट हो रही है। चिरंजीव सुधाकर शर्मा के भगीरथ प्रयत्न से तीनों की संवेत धारा, गंगा की धारा के प्रति हमारा समर्पण है। ज्ञान गंगा पुनातु व:!

- डाॅ.आनंदकृष्ण
सुपुत्र - राय कृष्णदास
अमेठी कोठी,वाराणसी ( उत्तर प्रदेश)

“अयोजित यात्रा का सुफल मंथरा ‘ हिंदी के वरेण्य गीतकार पं. सुधाकर शर्मा के कर कमलों से महाप्रसाद की तरह प्राप्त हुआ। प्रबंध की एकार्थ योजना के अंतर्गत यह खंडकाव्य पवित्र सलिला सरयू मैया के साथ एकांत संवादों की उपज है !. सुधाकर जी की लेखनी की धार में क्षिप्रता और निर्माल्य के साथ नयी रचना सृष्टिस्थितिविनाशानां का सार्थक संकल्प समूची काव्य वस्तु में ध्वनित है!श्रेय धर्मी इस कृति का कथा संयोजन अपूर्व है! मेरी दृष्टि में क्या भाव, क्या भाषा,सभी के वज़ूद की रक्षा में कवि सजग और समर्थ लेखनी का धनी है!”

- डॉ. सुमेर सिंह शैलेश
सतना (म. प्र.)

एक पांडुलिपि को दो बार पढ़ने का यह मेरा पहला अवसर है! कविवर श्री सुधाकर शर्मा ने रामकथा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण नारी पात्र’ मंथरा ‘ पर अपनी कलम चलायी! मंथरा रामकथा में एक कुपात्र मानी गयी !…. ऐसे कुपात्र को अपने सकारात्मक सारस्वत सोच से सुपात्र में बदल देना सुधाकर शर्मा का नया अवदान है!… मंथरा पर कवि को बधाई ! हनुमान जी का आभार सर्ग इस काव्य कृति को समझने के लिये सबसे पहले पठनीय है! “

- बालकवि बैरागी
नीमच ( मप्र )

श्री सुधाकर शर्मा एक सिद्धहस्त लेखक हैं!
… ‘गेय-अगेय’ के संस्मरणों में इतिहास की इतनी भूली बिसरी यादें हैं, राजनीति की इतनी अन्तरंग कथाएँ हैं, संगीत की इतनी मूर्च्छनाएँ हैं कि पाठक इन्हें पढ़ कर अधिक समझदार,अधिक जानकार और अधिक संवेदनशील हो उठता है! हिंदी कविता के मैथिलीशरण गुप्त और उनके परवर्ती युग को जानने और समझने के लिए तो गेय-अगेय के संस्मरण जैसे पावड़ों का कार्य करते हैं! सुधाकर शर्मा इन संस्मरणों में देखते एक पत्रकार की तरह हैं और लिखते एक कवि की तरह हैं! वास्तव में अच्छे और प्रभावशाली संस्मरण वही लिख सकता है जिसकी आखें गिद्ध की, भुजाए लठैत की और हथेलियाँ माँ की हों! सूक्ष्म अवलोकन,निर्भय साहस और संवेदनशील साहचर्य के बिना कोई अच्छे संस्मरण लिख ही नहीं सकता!

- डाॅ. कांतिकुमार जैन
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष
सागर विश्वविद्यालय सागर

काव्य की दृष्टि से ‘ रत्नावली ‘ निष्काम कर्मयोगिनी की गाथा ही नहीं अपितु साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान रत्नों की मंजूषा है। इस कृति के रचनाकार पं. सुधाकर शर्मा जी स्वनामधन्य कवि हैं। प्रबंध की दिशा में उनकी लेखकीय पटुता का प्रमाण है रत्नावली। सुधाकर जी की दृष्टि में सर्वथा उपेक्षित पात्रों का एक नया परिचय देने के संकल्प ही प्रतिबद्ध होते रहे हैं।यह उनकी गहरी संवेदनशीलता और चिंतन-दृष्टि की नव्यता का ही सुफल है। मैंने यह अनुभव किया है कि रचनात्मक क्षितिज में वैशिष्ट्य और श्रेष्ठताओं का समुच्चय उपस्थित करने की अद्भुत ताकत उनकी लेखनी में है।

- डाॅ.सुमेर सिंह 'शैलेश '
हिंदी विभागाध्यक्ष
शासकीय महाविद्यालय सतना (मप्र)

पण्डित सुधाकर शर्मा केवल कवि नहीं, एक जीवन्त सांस्कृतिक पुरुष हैं। उनके भीतर कविता और संगीत का, धर्म और अध्यात्म का, लोक और वेद का, तन्त्र और ज्योतिष का, समय और समाज का, इतिहास और राजनीति का विराट् समन्वय है। बाहर से देखने पर उनका व्यक्तित्व बिखरा बिखरा-सा है। उनके व्यक्तित्व के विविध आयाम हैं। वे कभी पत्रकार के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं, तो कभी संस्मरणकार के रूप में। कभी कवि-मंचों के सधे हुए कलाकार होते हैं, तो कभी हिन्दी-सिनेमा के गीतकार । कभी व्यंग्य के नश्तर से राजनीतिज्ञों की शल्य चिकित्सा करते हैं, तो कभी गुप्त-बखरी में छिपे हिन्दी के चिरदानी को उजागर करते हैं। वस्तुतः उनका व्यक्तित्व उस खण्डित शिला की तरह दिखायी पड़ता, जो बाहर से अनगढ़ होते हुए भी अपने भीतर भगवान् की मूर्ति को सहेजे हुए है। पण्डित सुधाकर शर्मा के इसी खण्डित व्यक्तित्व के भीतर एक ऐसी मूर्ति अन्तिर्निहित है, जो ‘कवयो मन्त्र द्रष्टारः’ को नवीन अर्थबोध प्रदान करती है। सुधाकरजी की कविता ‘धर्मयुग’ और ‘युगधर्म’ – दोनों की साक्षी है। पण्डित सुधाकर शर्मा का कवि-कर्म प्रेरित करता है। कविता के शाश्वत स्वरूप को अभिनव निरुक्त का शब्दार्थ देता है। हृदय के सहज रूप की निश्छल अभिव्यक्ति ही सुधाकर की कविता का मूलमन्त्र है। उनकी ‘मन्थरा’ स्त्री के ऊपर युगों युगों से लगाये गये कालुष्य का मार्जन करती है। ‘पाषाणी’ एक नये दृष्टिबोध के साथ स्त्री के चरित्र को विस्तृत आकाश प्रदान करती है। इसी तरह ‘रत्नावली’ की रत्ना अपने स्त्री – धर्म का पालन करते युगकवि तुलसी से भी बड़ी हो जाती हैं। स्त्री – चरित्र के जिस अभिनव बिम्ब को हु राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने युग-दर्पण में उतारा था, उसे शीर्ष पर पहुँचाने का काम पण्डित सुधाकर शर्मा ने किया है।

- डाॅ. जितेन्द्र कुमार सिंह संजय
चंद्रकुटी देवगढ़(सोनभद्र)उप्र

पं. सुधाकर शर्मा की अनेक रचनाओं को स्वरबद्ध कर गाने एवं देश के अन्य ख्याति प्राप्त गायकों – गायिकाओं से गवाने के मुझे सुयोग प्राप्त हुए हैं। श्री शर्मा की रचनाओं में भाषा और भावों का मधुर छन्दात्मक समन्वय प्रशंसनीय है।

- अनूप जलोटा
मुंबई

पं. सुधाकर शर्मा के विषय में महीयसी महादेवी वर्मा,डाॅ. शिवमंगल सिंह सुमन,डाॅ. हरिवंश राय बच्चन,डाॅ. धर्मवीर भारती जैसे अनेक मनीषी साहित्यकारों ने मुक्तकंठ से सराहना करते हुए लिखा है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अनन्य प्रेरक गुरुवत मुंशी अजमेरी जी (पं. प्रेमविहारी पाचोलिया) के प्रपौत्र होने के नाते मेरा सुधाकर जी से चौथी पीढ़ी का रिश्ता है। मेरे पितामह महामना मदनमोहन मालवीय जी और श्रद्धेय मुंशी जी के नाते सुधाकर शर्मा जी मेरे परिजन ही हैं! पूर्ववर्ती साहित्य सेवियों, विशेषत: क्रांतिकारी देशभक्तों के प्रति पं. सुधाकर शर्मा जी की अनन्य निष्ठा अनुकरणीय है।

- गिरिधर मालवीय
पूर्व न्यायाधीश उच्च न्यायालय

आयुष्मान सुधाकर पर लिखना अपने आप पर लिखना है। मैं तो सुधाकर पर गर्व करता हूॅ क्योंकि वह पूज्य मुंशीजी और दद्दा की चौथी पीढ़ी की साहित्य साधना का प्रवाह है!

- ऊर्मिलाशरण गुप्त
सुपुत्र-मैथिलीशरण गुप्त
चिरगाॅव(झाॅसी)

सारा हिंदी जगत जानता है कि पूज्य दद्दा और पूज्य बापू (मैथिलीशरण गुप्त- सियारामशरण गुप्त) परम श्रद्धेय मुंशी अजमेरी(पं. प्रेमबिहारी पाचोलिया) जी के प्रति कितना अकूत प्रेम और श्रद्धाभाव रखते थे ! “प्रेम” के उसी अटूट बंधन में हम सब आज भी सुधाकर जी से सम्बद्ध हैं! निश्चय ही यह गर्व का विषय है कि सुधाकर जी सही मायने में पूज्य मुंशीजी, दद्दा और बापू की परम्परा को अधिमानित कर श्रेष्ठतम साहित्य रच रहे हैं! माॅ वाणी की कृपा और पूर्वजों का आशीर्वाद इसी तरह सुधाकर जी से निरंतर यशस्वी सृजन कराता रहे, यही हमारी आत्मीय कामना है! हमें विश्वास है कि आगत पीढ़ियाॅ चिरगाॅव को पं. सुधाकर शर्मा के नाम से भी जानेंगीं ! मंगल कामनाओं सहित…

प्रमोद कुमार गुप्त
साहित्य सदन चिरगाँव-झाॅसी